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BIHAR CHUNAAV : बिहार चुनाव में क्लीन बोल्ड हुआ महागठबंधन: NDA 200 पार! जाने चुनावी विश्लेषण

बिहार की जनता के मन में 90 के दशक के उस दौर की यादें आज भी ताजा हैं, जिसे ‘जंगलराज’ कहा जाता है.

चुनाव प्रचार के दौरान एनडीए ने इस मुद्दे को प्रभावी ढंग से उठाया.

एनडीए ने तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाए जाने के बाद मतदाताओं को लालू प्रसाद यादव के शासनकाल की याद दिलाई, जिससे सुरक्षा और कानून-व्यवस्था को लेकर आशंकाएं पैदा हुईं.

Bihar Election Analysis: बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजे लगभग सामने आ चुके हैं और सत्ताधारी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) ने उम्मीद से कहीं ज्यादा बड़ी जीत हासिल करते हुए बहुमत का आंकड़ा पार कर लिया है. विरोधी महागठबंधन को करारी हार का सामना करना पड़ा है. इस बंपर विजय ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि बिहार की जनता ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के ‘सुशासन’ पर भरोसा जताया है. आखिर क्या वजह रही कि तमाम कयासों को धता बताते हुए एनडीए ने इतना बड़ा उलटफेर किया? आइए, जानते हैं एनडीए के इस ऐतिहासिक जीत के 5 सबसे बड़े कारण…

जाति नहीं, वोटों को जोड़ने का ‘सटीक समीकरण’

बिहार की राजनीति में जातिगत समीकरणों की अहमियत हमेशा रही है, लेकिन इस बार एनडीए ने इसे एक कदम आगे बढ़ाया. यह जीत किसी एक जाति के दम पर नहीं, बल्कि वोटों को जोड़ने की राजनीति का नतीजा है. भारतीय जनता पार्टी (BJP) और जनता दल यूनाइटेड (JDU) का एक साथ आना सबसे बड़ी ताकत थी.

इतना ही नहीं, चिराग पासवान की लोजपा (रामविलास), जीतन राम मांझी की ‘हम’ और उपेंद्र कुशवाहा की आरएलएसपी जैसे छोटे जनाधार वाले दलों को साथ लाने से एनडीए ने अलग-अलग जातियों और समुदायों के वोटों को सफलतापूर्वक अपने पाले में कर लिया. सीटों की यह सटीक साझेदारी जीत के लिए निर्णायक साबित हुई.

‘सुशासन बाबू’ की साफ छवि पर अटूट भरोसा

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की ‘सुशासन बाबू’ की छवि ने एक बार फिर कमाल किया. पिछले कई वर्षों से सत्ता में रहने के बावजूद, नीतीश कुमार की व्यक्तिगत ईमानदारी पर कोई दाग नहीं लगा है. उन पर किसी भी तरह के बड़े भ्रष्टाचार का आरोप न लगना, खासकर युवा और शिक्षित मतदाताओं के बीच, एक बड़ा सकारात्मक संदेश गया. वहीं, तेजस्वी यादव की युवा और आक्रामक शैली के सामने नीतीश कुमार का शांत, अनुभवी और सुशासन का चेहरा मतदाताओं को राज्य की स्थिरता के लिए अधिक भरोसेमंद लगा.

‘जंगलराज’ की वापसी का डर

बिहार की जनता के मन में 90 के दशक के उस दौर की यादें आज भी ताजा हैं, जिसे ‘जंगलराज’ कहा जाता है. चुनाव प्रचार के दौरान एनडीए ने इस मुद्दे को प्रभावी ढंग से उठाया. एनडीए ने तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाए जाने के बाद मतदाताओं को लालू प्रसाद यादव के शासनकाल की याद दिलाई, जिससे सुरक्षा और कानून-व्यवस्था को लेकर आशंकाएं पैदा हुईं. खासकर बुजुर्ग और महिला मतदाताओं के बीच यह डर प्रभावी रहा, जिन्होंने बदलाव के जोखिम के बजाय वर्तमान व्यवस्था को ही बेहतर समझा.

 

महिला वोटर्स ने किया ‘पलटवार’

इस चुनाव में महिला मतदाता एनडीए के लिए सबसे बड़ा गेमचेंजर साबित हुईं. नीतीश कुमार की महिला-केंद्रित योजनाओं ने उन्हें एनडीए का सबसे वफादार वोट बैंक बना दिया. चुनाव से ठीक पहले ‘मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना’ के तहत करोड़ों महिलाओं को 10,000 हजार रुपए की आर्थिक सहायता मिली.

इसके इतर, शराबबंदी , साइकिल योजना और पंचायती राज में महिलाओं को आरक्षण जैसी नीतियों ने महिलाओं के बीच नीतीश कुमार की लोकप्रियता को बनाए रखा, जिससे उन्होंने एकजुट होकर एनडीए के पक्ष में मतदान किया.

केंद्र सरकार के विकास कार्यों का प्रभाव

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार द्वारा किए गए विकास कार्य और कल्याणकारी योजनाओं का सीधा फायदा एनडीए गठबंधन को मिला. मतदाताओं को यह संदेश साफ गया कि केंद्र और राज्य में एक ही गठबंधन की सरकार होने से विकास की रफ्तार तेज होगी. मुफ्त राशन, आवास योजनाएं और अन्य केंद्रीय योजनाओं के लाभार्थी वर्ग ने एनडीए को मजबूती से समर्थन दिया, जिससे यह जीत और भी आसान हो गई.

कुल मिलाकर, एनडीए की यह जीत केवल सीटों की संख्या तक सीमित नहीं है, बल्कि यह रणनीति की जीत, अनुभव पर भरोसे और विकास की आकांक्षाओं की जीत है. इसने बिहार की राजनीति में एक बार फिर नीतीश कुमार और नरेंद्र मोदी की जोड़ी का दबदबा कायम कर दिया है.

 

Navin Dilliwar

Editor, thesamachaar.in

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